ज़िंदगी में कुछ यादें ऐसी होती हैं,जिनकी याद भर आते ही अब होंठों पर मुस्कान तैर जाती है। लेकिन,घटना(हादसा) के वक्त काटो तो खून नहीं जैसा मामला होता है। ऐसा ही एक दिलचस्प किस्सा आज याद आ गया है।
फतेहपुर सीकरी के एलीफेंट टॉवर की महिमा आप सुन चुके हैं। और उसका नतीजा भी मालूम है। लेकिन, एलीफेंट टॉवर पर चढ़ने और हमारे विवाह के बीच एक दौर और आया था-"एंगेजमेंट पीरियड"। बड़ा रुमानी दौर होता है ये। अब सगाई हो चुकी थी, तो अपनी भावी पत्नी से फोन पर बतियाने की खुली छूट मिल चुकी थी। लेकिन, हिन्दुस्तानियों को उंगली पकड़ कर पौचा पकड़ने की आदत होती है,सो इस खुली छूट का नाजायज फायदा उठाना हमने शुरु किया। वो ऐसे कि दिन तो दिन...रात में तीन-चार और कभी कभी पांच बजे तक बतियाते रहते। अब,क्या बात होती,ये पूछने का आपको हक नहीं है!
तो जनाब,ऐसी ही एक अंधियारी रात को हम मोहतरमा से बतिया रहे थे। चूंकि,वार्ता की ये रात्रिकालीन सेवा रात 12 बजे ही शुरु होती थी,तो सेवा सुचारु रुप से चल रही थी। रात के तीन-साढ़े तीन बज रहे थे कि अचानक फोन कट गया। हमारे फोन से रिंग टोन गायब! मुश्किल ये कि ऐसी हालत में दूसरी तरफ से फोन लगाने की कोशिश जारी रहनी थी।
अब,मरता क्या न करता। रात के तीन बजे घर की बालकनी में मेन टेलीफोन तार को देखने का बीड़ा उठाया। घर के अंदर से ऊंचा स्टूल सटाया और बारीकी से जांच की गई। गॉट इट....! तार ही कुछ निकला सा दिख रहा था...अब काम बन गया......।
बस,काम बन जाने की सोच के साथ अपन तल्लीनता से रात के साढे तीन बजे फोन ठीक करने में जुट गए। लेकिन, इस ऑपरेशन "रात्रि सेवा" को पूरा कर हम नीचे उतरते,इससे पहले हमारी आंख नीचे उतरी, और देखा तो हमारे बापू खड़े होकर पूरा तमाशा देख रहे थे।
अंधियारे में बापू के चेहरे पर क्रोध था या ज्ञान से पहले का कालिदास पाने का पश्चाताप-ये तो अपन नहीं देख पाए। लेकिन,पिताजी ने ये कहकर और हालत खराब कर दी....."क्यों,फोन कट गया था क्या?"
होश फाख्ता थे,शब्द जुबां का साथ छोड़ चुके थे। गर्दन हिलायी,और फौरन बिस्तर पर शरीर दे मारा। हां, थोड़ी देर बात एक घंटी मारकर भावी पत्नी को जगाया...बताया....और "हादसे का ज़िक्र" कर फिर सो गया....।
बुधवार, 3 सितंबर 2008
शनिवार, 30 अगस्त 2008
ट्रिगर दबा,और वो मर गया.....
एक के हाथ में कट्टा था। नली दूसरे के माथे पर। बोल-चांदी सिंह...मार दिया जाए या छोड़ दिया जाए।
मज़ाक मत कर रिंकू। चांदी थरथरा रहा था। माथे से पसीना का फुव्वारा फूट रहा था,और शब्द जुबां का साथ छोड़ चुके थे।
हम जैसे चिरकुट दोस्त इस तमाशे का मज़ा ले रहे थे....।
दरअसल, मुहल्ले का हमारा दोस्त चांदी कथित तौर पर बेहद डरपोक था।(शब्दावली बिगाड़ू तो हग्गू था)। वो घर में चूहे,कॉकरोच,बिल्ली से लेकर बाहर सड़क पर घूमने वाली गाय-भैंसों तक सबसे डरता था।अब,दुनिया का दस्तूर है कि जो डरता है,वो मरता है। सो,दोस्त लोग चांदी को डराने का ही एक खेल अक्सर खेला करते थे।
उस दिन ये खेल वीभत्स हो गया। हमारे एक दोस्त,जिनके भाई साहब इलाके के दबंगों में से एक थे, ने हमारे दूसरे दोस्त मिंटू की दुकान पर अपने कट्टे का प्रदर्शन किया। देसी कट्टे के सार्वजनिक प्रदर्शन के बाद कुछ दोस्त मिंटू की दुकान के बाहर गपशप करने लगे। लेकिन, इस दौरान कट्टा दुकान के भीतर रखा गया। और पता नहीं,मिंटू के बड़े भाई रिंकू को क्या सूझी कि उसने कट्टा लेकर चांदी के माथे पर टिका दिया।
रिंकू के एक हाथ में कट्टा था। नली दूसरे के माथे पर। बोल-चांदी सिंह...मार दिया जाए या छोड़ दिया जाए। डायलॉग बाजी हो रही थी।
कंपकंपाया चांदी को कुछ दोस्त देख भी रहे थे,लेकिन शायद किसी को अंदाज नहीं था कि अब क्या होगा।
अचानक...रिंकू ने ट्रिगर दबा दिया......और यकीं जानिए ट्रिगर दबते ही चांदी गिर पड़ा। सब हंस पड़े। खिलखिलाकर। गोली चली नहीं,चांदी डर के मारे गिर पड़ा था।
लेकिन ये क्या...??? इस तमाशे की भनक कट्टे के मालिक यानी हमारे दोस्त को लगी,तो वो दौड़कर घटनास्थल पर पहुंचा। उसने सीधे रिंकू को मां-बहन की गालियां दी और कट्टा खोल कर दिखाया। कट्टा लोड़ था.....बस मिस हो गया।
देसी तमंचे की ये कमी(खूबी) पहली बार हमारे लिए वरदान साबित हुई।
अब,बारी चांदी की थी। चांदी उठा,और रिंकू की ऐसी-तैसी करते हुए दौड़ पड़ा। और हम सब चुपचाप वहां से खिसक लिए....।
दरअसल,औरेया में कट्टे,रिवॉल्वर छात्रों के हाथ में होना बड़ी बात नहीं थी। लेकिन,इस घटना ने कहीं न कहीं हमें सिखा दिया कि रंगबाजी के चक्कर में ऐसे खेल-मौत के खेल-भी हो सकते हैं।
मज़ाक मत कर रिंकू। चांदी थरथरा रहा था। माथे से पसीना का फुव्वारा फूट रहा था,और शब्द जुबां का साथ छोड़ चुके थे।
हम जैसे चिरकुट दोस्त इस तमाशे का मज़ा ले रहे थे....।
दरअसल, मुहल्ले का हमारा दोस्त चांदी कथित तौर पर बेहद डरपोक था।(शब्दावली बिगाड़ू तो हग्गू था)। वो घर में चूहे,कॉकरोच,बिल्ली से लेकर बाहर सड़क पर घूमने वाली गाय-भैंसों तक सबसे डरता था।अब,दुनिया का दस्तूर है कि जो डरता है,वो मरता है। सो,दोस्त लोग चांदी को डराने का ही एक खेल अक्सर खेला करते थे।
उस दिन ये खेल वीभत्स हो गया। हमारे एक दोस्त,जिनके भाई साहब इलाके के दबंगों में से एक थे, ने हमारे दूसरे दोस्त मिंटू की दुकान पर अपने कट्टे का प्रदर्शन किया। देसी कट्टे के सार्वजनिक प्रदर्शन के बाद कुछ दोस्त मिंटू की दुकान के बाहर गपशप करने लगे। लेकिन, इस दौरान कट्टा दुकान के भीतर रखा गया। और पता नहीं,मिंटू के बड़े भाई रिंकू को क्या सूझी कि उसने कट्टा लेकर चांदी के माथे पर टिका दिया।
रिंकू के एक हाथ में कट्टा था। नली दूसरे के माथे पर। बोल-चांदी सिंह...मार दिया जाए या छोड़ दिया जाए। डायलॉग बाजी हो रही थी।
कंपकंपाया चांदी को कुछ दोस्त देख भी रहे थे,लेकिन शायद किसी को अंदाज नहीं था कि अब क्या होगा।
अचानक...रिंकू ने ट्रिगर दबा दिया......और यकीं जानिए ट्रिगर दबते ही चांदी गिर पड़ा। सब हंस पड़े। खिलखिलाकर। गोली चली नहीं,चांदी डर के मारे गिर पड़ा था।
लेकिन ये क्या...??? इस तमाशे की भनक कट्टे के मालिक यानी हमारे दोस्त को लगी,तो वो दौड़कर घटनास्थल पर पहुंचा। उसने सीधे रिंकू को मां-बहन की गालियां दी और कट्टा खोल कर दिखाया। कट्टा लोड़ था.....बस मिस हो गया।
देसी तमंचे की ये कमी(खूबी) पहली बार हमारे लिए वरदान साबित हुई।
अब,बारी चांदी की थी। चांदी उठा,और रिंकू की ऐसी-तैसी करते हुए दौड़ पड़ा। और हम सब चुपचाप वहां से खिसक लिए....।
दरअसल,औरेया में कट्टे,रिवॉल्वर छात्रों के हाथ में होना बड़ी बात नहीं थी। लेकिन,इस घटना ने कहीं न कहीं हमें सिखा दिया कि रंगबाजी के चक्कर में ऐसे खेल-मौत के खेल-भी हो सकते हैं।
गुरुवार, 28 अगस्त 2008
शादी के लिए परेशान नौजवानों के लिए टोटका

लड़कियां भौचक। एतबार भी नहीं, इंकार भी नहीं। दिमाग कहे चलो ऊपर, लेकिन दिल कहे न..न....।
ये नज़ारा नहीं, एक किस्सा है। करीब 10 साल पहले का एक किस्सा। अपनी पोस्ट ग्रेजुएशन के आखिरी साल में क्लास के कई लड़के-लड़कियां घूमने के लिए फतेहपुर सीकरी गए। कैसे गए-ये अलग किस्सा है। लेकिन,सलीम चिश्ती की दरगाह पर इबादत के बाद हम पहुंचे हाथी मीनार यानी एलिफेंट टॉवर।
फतेहपुर सीकरी गए सभी लोगों ने एलिफेंट टॉवर देखा होगा। लेकिन,शायद दूर से। दरअसल,एलिफेंट टॉवर के लिए दरगाह से करीब पौन किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है,और वहां कुछ देखने को भी नहीं है। हाथी मीनार अकबर के एक प्रिय हाथी का मकबरा है,और कहते हैं कि डूबते हुए सूरज को देखने के लिए अकबर यहां अपनी पत्नी के साथ आते थे।
मज़ेदार बात ये कि कई बार सीकरी देखने के बावजूद इस बार हमने हर चीज़ को बारीक से समझने के लिए एक गाइड किया था। और गाइड ने ऐलान कर डाला-हाथी मीनार पर अगर कोई भी लड़का-लड़की साथ चढ़ा,तो उसकी शादी तय है। दावे के बोल थे-"यहां भाई-बहन भी साथ चढ़ें तो उनकी शादी हो जाती है"
अब, डंके की चोट पर गाइड भाईसाहब ने ऐलान किया तो साथ गई लड़कियों के पेशानी पर बल पड़ गए।
लड़कियां भौचक। एतबार भी नहीं, इंकार भी नहीं। दिमाग कहे चलो ऊपर, लेकिन दिल कहे न॥न....।
लड़कियां भौचक। एतबार भी नहीं, इंकार भी नहीं। दिमाग कहे चलो ऊपर, लेकिन दिल कहे न॥न....।
दरअसल,एलिफेंट टॉवर में सात घुमावदार मोड़ हैं,जिन्हें सात फेरे बता दिया जाता है। बहरहाल,आधे घंटे की कवायद के बाद सिर्फ एक लड़की ने हिम्मत दिखायी-मुझसे कहा,चलो मैं चलती हूं।
खैर,मैं और वो साथ चढ़े। बैठे। नीचे आए,और फिर कई दिनों तक इस किस्से को याद करते रहे।
लेकिन,क्लाइमेक्स ये कि इस किस्से के करीब एक साल बाद डेढ़ साल बाद हमने शादी कर ली। हम जब घूमने गए थे,तो मैं और मेरी पत्नी सिर्फ 'दोस्त' भर थे। लेकिन,वक्त के साथ संबंध घनिष्ठ हुए और घर वालों को भनक लगते ही विवाह संपन्न हो गया।
आज पत्नी ने सुबह सुबह ताना कसा (अगर मैं न मिलती,तो कोई तुमसे शादी न करता) तो ये दिलचस्प किस्सा याद आ गया।
वैसे,एक मित्र 'विवेक' को इसका कई दिनों तक मलाल भी रहा कि वो क्यों न 'उसके' साथ ऊपर चढ़े,जिसे वो.........। उसकी "वो" नीचे ही बैठी रही थी।
अब,दिमाग भले यकीं न करे, पर अपने साथ घटित हुआ है तो इसे टोटके के रुप में अपन भी बता डालते हैं। अगर कोई ये टोटका आजमाए तो अपना किस्सा जरुर लिखे। वैसे,इस टोटके का रिजल्ट आने में एक-आध साल लग सकता है,लिहाजा नतीजे का किस्सा थोड़ा ठहरकर सुनाएं।
सोमवार, 25 अगस्त 2008
सुपरमैन बाप बनाम सिंह इज किंग
बेटा,बाप को सुपरमैन की छठी औलाद समझता हो, और बाप एक छोटा सा काम न कर पाए तो इमेज की ऐसी तैसी हो जाती है। इन दिनों,अपने साथ भी यही हो रहा है.....बेटे को 'सिंह इज किंग' देखनी है, और अपनी ज़िंदगी में ऐसा पहली बार हुआ,जब तीन बार एक ही फिल्म देखने थिएटर पहुंचे हों, और न देख पाए हों....एक बार शो हाऊसफुल था, दूसरी बार भीड़ इतनी ज्यादा की पहली-दूसरी कतार का ही टिकट मुमकिन था,और कल चिरकुट अखबार ने गलत सूचना छापकर खेल बिगाड़ डाला। अखबार में छपा था कि सुबह 11 बजे का शो है,और शो उस थिएटर में साढ़े दस बजे ही शुरु हो ।
अब, बालक के साथ इतना भद्दा मजाक तीन बार हो,तो उसका रोना लाज़िमी है। उसने सीधा सवाल दागा-ये थिएटर होते ही क्यों है,पिक्चर देखने के लिए न, तो यहां टिकट क्यों नहीं मिलता?लेकिन,लुढ़िस किस्मत का रोना इसलिए भी ज्यादा आया कि इससे पहले हमने पिक्चर को लात मारी थी,पिक्चर ने हमें नहीं।
शुरुआत,25-26 साल पहले फिल्म 'दोस्ताना' से हुई थी। अपनी उम्र भी बालक की उम्र जितनी थी। फिल्म की शुरुआत में ही अमिताभ बच्चन ने रिवॉल्वर निकालकर बदमाशों पर फायरिंग शुरु की,तो लगा ये गोली सीधे अपनी छाती पर आ पड़ेगी। अपना रोना शुरु हो गया-चलो बाहर चलो। पिताजी ने,और बड़े भाई ने बहुत समझाया कि फिल्म में सब झूठ है,लेकिन जब जान पर बनी हो तो किसे समझ आता है?
दोस्ताना को लात मार दी गई......
इसके कुछ साल बाद,अपनी मां और बूआ के साथ राजबब्बर और स्मिता पाटील की फिल्म 'शपथ' देखने गया। इंटरवल तक मां और बूआ फिल्म को देखकर उखड़ चुके थे।
शपथ को लात मार दी गई....
इसके कई साल बाद 1991 में अमिताभ बच्चन की फिल्म "हम" आयी। औरेया में ये फिल्म रिलीज होते ही लगी। वरना,वहां फिल्म पांच-पांच महीने बाद लगती थी। हम का टिकट जुगाड़ना एक अलग किस्सा है,लेकिन पिताजी ने टिकट जुगाड़ी,और पूरा परिवार(कई रिश्तेदार घर आए थे) फिल्म देखने पहुंचा। लेकिन,औरेया के सूर्या टॉकीज का माहौल और घटिया प्रिंट देखकर सभी उखड़ गए।
हम को लात मार दी गई...
इसके बाद हाल के साल में हमारे बालक ने हम तुम,स्वदेश और ओमकारा नहीं देखने दी। सो इन्हें भी लात मार दी गई। पर सिंह इज किंग ने हमें ऐसी लात मारी है....कि दिमाग चकरघिन्नी बना हुआ है। दिन भर "सिंह इज किंग,सिंह इज किंग' गाने वाला बालक फिल्म देखे बिना मानेगा नहीं,सो इस बार पहले से टिकट लाकर फिल्म दिखानी होगी।
अब, बालक के साथ इतना भद्दा मजाक तीन बार हो,तो उसका रोना लाज़िमी है। उसने सीधा सवाल दागा-ये थिएटर होते ही क्यों है,पिक्चर देखने के लिए न, तो यहां टिकट क्यों नहीं मिलता?लेकिन,लुढ़िस किस्मत का रोना इसलिए भी ज्यादा आया कि इससे पहले हमने पिक्चर को लात मारी थी,पिक्चर ने हमें नहीं।
शुरुआत,25-26 साल पहले फिल्म 'दोस्ताना' से हुई थी। अपनी उम्र भी बालक की उम्र जितनी थी। फिल्म की शुरुआत में ही अमिताभ बच्चन ने रिवॉल्वर निकालकर बदमाशों पर फायरिंग शुरु की,तो लगा ये गोली सीधे अपनी छाती पर आ पड़ेगी। अपना रोना शुरु हो गया-चलो बाहर चलो। पिताजी ने,और बड़े भाई ने बहुत समझाया कि फिल्म में सब झूठ है,लेकिन जब जान पर बनी हो तो किसे समझ आता है?
दोस्ताना को लात मार दी गई......
इसके कुछ साल बाद,अपनी मां और बूआ के साथ राजबब्बर और स्मिता पाटील की फिल्म 'शपथ' देखने गया। इंटरवल तक मां और बूआ फिल्म को देखकर उखड़ चुके थे।
शपथ को लात मार दी गई....
इसके कई साल बाद 1991 में अमिताभ बच्चन की फिल्म "हम" आयी। औरेया में ये फिल्म रिलीज होते ही लगी। वरना,वहां फिल्म पांच-पांच महीने बाद लगती थी। हम का टिकट जुगाड़ना एक अलग किस्सा है,लेकिन पिताजी ने टिकट जुगाड़ी,और पूरा परिवार(कई रिश्तेदार घर आए थे) फिल्म देखने पहुंचा। लेकिन,औरेया के सूर्या टॉकीज का माहौल और घटिया प्रिंट देखकर सभी उखड़ गए।
हम को लात मार दी गई...
इसके बाद हाल के साल में हमारे बालक ने हम तुम,स्वदेश और ओमकारा नहीं देखने दी। सो इन्हें भी लात मार दी गई। पर सिंह इज किंग ने हमें ऐसी लात मारी है....कि दिमाग चकरघिन्नी बना हुआ है। दिन भर "सिंह इज किंग,सिंह इज किंग' गाने वाला बालक फिल्म देखे बिना मानेगा नहीं,सो इस बार पहले से टिकट लाकर फिल्म दिखानी होगी।
शुक्रवार, 22 अगस्त 2008
एक ‘महान’ क्रिकेटर का आकस्मिक निधन
सुबह के पांच-साढ़े पांच बजे, स्पोर्ट्स शू पहने आगरा के आरबीएस कॉलेज के मैदान के आठ दस चक्कर। फिर, जमकर एक्सरसाइज। और फिर, हाथ में बैट पकड़ने का मौका।
अब सिर्फ याद रह गई है उस क्रिकेट कैंप की। ज़िंदगी के कई क़िस्सों में ये क़िस्सा थोड़ा अलग है। वजह ये कि अगर वो कैंप पूरा हुआ होता,तो शायद ज़िंदगी का रुख कुछ और हुआ होता!
खैर,फिल्म पड़ोसन में बिन्दू के अब्बा ने जैसा कहा है-जब जब जो जो होना होना है,सो सो होगा, सो कुछ और हुआ।
हुआ यूं कि क्रिकेट कैंप में छठे सांतवे दिन ही औरेया के कुछ हमारे मित्र इस “ईर्ष्या में” आगरा के उस कैंप आ धमके कि कहीं पीयूष एक कैंप अटेंड कर ही सचिन तेंदुलकर न बन जाए!
सो जनाब, दो भाई लोग आ धमके। कैंप जारी था। फील्ड के आठ दस चक्कर कर हांफ ही रहा था कि दोनो दोस्त (कृपया दुश्मन पढ़ें) सामने खड़े थे। मुंबई से आया मेरा दोस्त,दोस्त को सलाम करो की तर्ज पर अपन भी दोस्तों के पास जा पहुंचे। बतियाने लगे। उनके कंधों पर हाथ धर खड़े हो गए इस्टाइल में.......
बस,जालिम कोच यह नज़ारा देख भड़क उठा। सीधे बुलाया,और गेट आउट का फ़रमान जारी कर डाला। हमने दो चार बार सॉरी,सॉरी बोला (वैसे,उस वक्त इससे ज्यादा अंग्रेजी आती भी नहीं थी। मेरा पूरा विश्वास है कि अगर चटरपटर अंग्रेजी में मैंने उससे कायदे से माफी मांग ली होती,तो वो बुला लेता) लेकिन उसने नहीं सुनी। अब,ज्यादा सुनने के अपन भी आदी नहीं,सो तीन सॉरी के बाद सीधे बोला....तेरी मां..........
तेल लेने गया कैंप....
(दुश्मन अपनी साज़िश में सफल हुआ। एक महान क्रिकेटर सिर्फ पत्रकार बन कर रह गया)
नोट-वैसे,इस किस्से की याद आज उस वक्त अचानक आ गई,जब क्रिकेट के मुद्दे पर अपने बॉस के साथ मीटिंग में बैठा। 1992 में इस कैंप को अटेंड करने तक मुझे भी हर मैच का लेखा जोखा जुबानी याद रहता था,लेकिन पता नहीं क्यों इसके बाद क्रिकेट में पूरा दिल नहीं रम पाया। हां,अब क्रिकगुरुऑनलाइनडॉटकॉम में रहते हुए फिर क्रिकेट की बारीकियों और उसकी नब्ज पकड़ने की कोशिश कर रहा हूं।
अब सिर्फ याद रह गई है उस क्रिकेट कैंप की। ज़िंदगी के कई क़िस्सों में ये क़िस्सा थोड़ा अलग है। वजह ये कि अगर वो कैंप पूरा हुआ होता,तो शायद ज़िंदगी का रुख कुछ और हुआ होता!
खैर,फिल्म पड़ोसन में बिन्दू के अब्बा ने जैसा कहा है-जब जब जो जो होना होना है,सो सो होगा, सो कुछ और हुआ।
हुआ यूं कि क्रिकेट कैंप में छठे सांतवे दिन ही औरेया के कुछ हमारे मित्र इस “ईर्ष्या में” आगरा के उस कैंप आ धमके कि कहीं पीयूष एक कैंप अटेंड कर ही सचिन तेंदुलकर न बन जाए!
सो जनाब, दो भाई लोग आ धमके। कैंप जारी था। फील्ड के आठ दस चक्कर कर हांफ ही रहा था कि दोनो दोस्त (कृपया दुश्मन पढ़ें) सामने खड़े थे। मुंबई से आया मेरा दोस्त,दोस्त को सलाम करो की तर्ज पर अपन भी दोस्तों के पास जा पहुंचे। बतियाने लगे। उनके कंधों पर हाथ धर खड़े हो गए इस्टाइल में.......
बस,जालिम कोच यह नज़ारा देख भड़क उठा। सीधे बुलाया,और गेट आउट का फ़रमान जारी कर डाला। हमने दो चार बार सॉरी,सॉरी बोला (वैसे,उस वक्त इससे ज्यादा अंग्रेजी आती भी नहीं थी। मेरा पूरा विश्वास है कि अगर चटरपटर अंग्रेजी में मैंने उससे कायदे से माफी मांग ली होती,तो वो बुला लेता) लेकिन उसने नहीं सुनी। अब,ज्यादा सुनने के अपन भी आदी नहीं,सो तीन सॉरी के बाद सीधे बोला....तेरी मां..........
तेल लेने गया कैंप....
(दुश्मन अपनी साज़िश में सफल हुआ। एक महान क्रिकेटर सिर्फ पत्रकार बन कर रह गया)
नोट-वैसे,इस किस्से की याद आज उस वक्त अचानक आ गई,जब क्रिकेट के मुद्दे पर अपने बॉस के साथ मीटिंग में बैठा। 1992 में इस कैंप को अटेंड करने तक मुझे भी हर मैच का लेखा जोखा जुबानी याद रहता था,लेकिन पता नहीं क्यों इसके बाद क्रिकेट में पूरा दिल नहीं रम पाया। हां,अब क्रिकगुरुऑनलाइनडॉटकॉम में रहते हुए फिर क्रिकेट की बारीकियों और उसकी नब्ज पकड़ने की कोशिश कर रहा हूं।
लेबल:
आगरा,
औरेया,
क्रिकेट,
दुश्मन,
सचिन तेंदुलकर
क़िस्से हैं ईमेल पर
रविवार, 6 मई 2007
जब बाबा जी बजवा देते हिन्दी में घंटा !
तुम्हारी मौसी मुंबई में हैं।
तुम्हारे जन्म की तारीख फलां है।
तुम्हारे घर में ऐसा उपकरण आऩे वाला है,जो पूरे कस्बे में अभी नहीं है।
बेटी, तुम्हारे पति आज बैंक नहीं गए।
बाबा जी की हर बात सही निकली। चमत्कार को नमस्कार करना ही पड़ा।
ये बात सन् 1993 की है शायद। उन दिनों हमारी जान-पहचान एक बाबा जी से हुई। बाबा जी भले इंसान थे, कभी कुछ मांगा नहीं-लिया नहीं।
खास बात ये कि हमारे बारे में,हमारे पड़ोसियों के बारे में बतायी बातें सच निकलीं। हमने अपने रिश्तेदारों को भी दिल्ली-कानपुर-आगरा से आऩे का न्यौता दे डाला। भइए, बाबा जी चमत्कारी टाइप के हैं, पूछ सको तो पूछ।
वैसे, मैं ईमानदारी से कहता हूं कि उन्होंने कुछ बातें ऐसी बतायीं-जो शायद मेरे अलावा किसी और को नहीं मालूम होंगी।
ज़ाहिर है, बाबा जी ने अपने प्रभावित कर रखा था। औरेया के उन बाबा जी का नाम याद नहीं, क्योंकि हम उन्हें बाबा जी ही कहते थे, लेकिन लगातार उनसे संपर्क होने के कारण उनका हमारे मुहल्ले में आना-जाना सामान्य हो गया था। उनके मुरीदों की संख्या लगातार बढ़ रही थी-और कोई ऐसा शख्स नहीं मिला था-जो कहे कि बाबा फ्रॉड हैं।
इन्हीं दिनों, हमारे इंटर के पेपर नजदीक आ गए। पहला पेपर हिन्दी का था। लालच बुरी बला है-और हम लालची नहीं, ऐसा भी नहीं। मन मे खयाल आया कि अगर बाबा जी चमत्कार से सवाल बता दें तो मज़ा आ जाए। लफड़े खत्म।
हमनें ये दिली ख्वाहिश बाबा जी को बतायी तो उन्होंने भी कह डाला- पेपर से एक दिन पहले आना।
भइए, हम और हमारा दोस्त पेपर से ऐन पहले के दिन शाम को बाबा जी के पास पहुंच गए। बाबा जी ने किताब में 10-12 सवालों पर टिक मार्क लगा दिया। हमने सोचा कि वाह बेटा! हो गया खेल! अब तो झंडा गढ जाएगा। दरअसल, बाबा जी पर अविश्वास करने का कोई ठोस कारण नहीं था।
रात में इम्तिहान की आखिरी तैयारी में जुटे तो उन सवालों को ठोक-बजाकर समझ लिया-जिन्हें बाबा जी ने बताया था। लेकिन, पहला पेपर था और अपन अक्ल से बिलकुल चिरकुट नहीं थे ( थोड़े तो थे ही, तभी गए थे बाबा जी के पास)-लिहाजा बाकी तैयारी भी कर डाली।
इम्तिहान वाले दिन अपनी दोस्ती का हक अदा करने के लिए कुछ दोस्तों को बाबाजी मार्का सवाल आउट कर डाले। भाई, यारी का सवाल है।हम 100 नंबर लाएं, अपना दोस्त 60 भी नहीं- ये अच्छी बात नहीं है। सो, दोस्तों को कुछ सवाल ये कहकर बता डाले कि भइए,बहुत इंपोर्टेंट सवाल है-किसी हिन्दी के विद्वान अंकल ने बताए हैं।
लेकिन, पर्चा आया तो एक पल के लिए हवाइयां उड़ गईँ। बाबा जी पूरी तरह फेल। एक सवाल नहीं गिरा साला पर्चे में उऩका। वो तो अच्छा था कि तैयारी ठीक ठाक थी और हिन्दी में अपना हाथ तंग नहीं था-वरना बाबा जी ने तो बजवा ही दिया था हिन्दी में घंटा। पेपर अच्छा ही हुआ...।
इस वाक्ये के बाद बाबा जी के पास हमारा जाना धीरे धीरे छूट गया। कई वजहों से। लेकिन,यह मानने को अभी भी मन नहीं करता कि वो फ्रॉड थे।
हां, कुछ ज्ञानी टाइप के लोगों ने बाद में कहा-बाबा जी के पास एक जिन्न था, जो भूत की बातें तो खोज लाता था, पर कल क्या होगा-इसमें जिन्न की भी हवा निकल जाती।
अब कोई कुछ भी सोचे-लेकिन दो बातें साफ हैं। पहली बात ये कि बाबा जी ने कई बातें बिलकुल ठीक बताई थीं, इसलिए उऩ पर यकीं हो गया। दूसरी बात ये कि अगर धोखे में भी हम अगर बाबा जी पर ही पूरा यकीं कर लेते तो 12वीं में हमारा हिन्दी में ही घंटा बज जाता। जी हां-हिन्दी। जिसमें किसी का घंटा नहीं बजता। साइंस,मैथ्स में तो दुनिया का घंटा बजता है,हमारा पहली बार हिन्दी में बज गया होता।
-पीयूष
तुम्हारे जन्म की तारीख फलां है।
तुम्हारे घर में ऐसा उपकरण आऩे वाला है,जो पूरे कस्बे में अभी नहीं है।
बेटी, तुम्हारे पति आज बैंक नहीं गए।
बाबा जी की हर बात सही निकली। चमत्कार को नमस्कार करना ही पड़ा।
ये बात सन् 1993 की है शायद। उन दिनों हमारी जान-पहचान एक बाबा जी से हुई। बाबा जी भले इंसान थे, कभी कुछ मांगा नहीं-लिया नहीं।
खास बात ये कि हमारे बारे में,हमारे पड़ोसियों के बारे में बतायी बातें सच निकलीं। हमने अपने रिश्तेदारों को भी दिल्ली-कानपुर-आगरा से आऩे का न्यौता दे डाला। भइए, बाबा जी चमत्कारी टाइप के हैं, पूछ सको तो पूछ।
वैसे, मैं ईमानदारी से कहता हूं कि उन्होंने कुछ बातें ऐसी बतायीं-जो शायद मेरे अलावा किसी और को नहीं मालूम होंगी।
ज़ाहिर है, बाबा जी ने अपने प्रभावित कर रखा था। औरेया के उन बाबा जी का नाम याद नहीं, क्योंकि हम उन्हें बाबा जी ही कहते थे, लेकिन लगातार उनसे संपर्क होने के कारण उनका हमारे मुहल्ले में आना-जाना सामान्य हो गया था। उनके मुरीदों की संख्या लगातार बढ़ रही थी-और कोई ऐसा शख्स नहीं मिला था-जो कहे कि बाबा फ्रॉड हैं।
इन्हीं दिनों, हमारे इंटर के पेपर नजदीक आ गए। पहला पेपर हिन्दी का था। लालच बुरी बला है-और हम लालची नहीं, ऐसा भी नहीं। मन मे खयाल आया कि अगर बाबा जी चमत्कार से सवाल बता दें तो मज़ा आ जाए। लफड़े खत्म।
हमनें ये दिली ख्वाहिश बाबा जी को बतायी तो उन्होंने भी कह डाला- पेपर से एक दिन पहले आना।
भइए, हम और हमारा दोस्त पेपर से ऐन पहले के दिन शाम को बाबा जी के पास पहुंच गए। बाबा जी ने किताब में 10-12 सवालों पर टिक मार्क लगा दिया। हमने सोचा कि वाह बेटा! हो गया खेल! अब तो झंडा गढ जाएगा। दरअसल, बाबा जी पर अविश्वास करने का कोई ठोस कारण नहीं था।
रात में इम्तिहान की आखिरी तैयारी में जुटे तो उन सवालों को ठोक-बजाकर समझ लिया-जिन्हें बाबा जी ने बताया था। लेकिन, पहला पेपर था और अपन अक्ल से बिलकुल चिरकुट नहीं थे ( थोड़े तो थे ही, तभी गए थे बाबा जी के पास)-लिहाजा बाकी तैयारी भी कर डाली।
इम्तिहान वाले दिन अपनी दोस्ती का हक अदा करने के लिए कुछ दोस्तों को बाबाजी मार्का सवाल आउट कर डाले। भाई, यारी का सवाल है।हम 100 नंबर लाएं, अपना दोस्त 60 भी नहीं- ये अच्छी बात नहीं है। सो, दोस्तों को कुछ सवाल ये कहकर बता डाले कि भइए,बहुत इंपोर्टेंट सवाल है-किसी हिन्दी के विद्वान अंकल ने बताए हैं।
लेकिन, पर्चा आया तो एक पल के लिए हवाइयां उड़ गईँ। बाबा जी पूरी तरह फेल। एक सवाल नहीं गिरा साला पर्चे में उऩका। वो तो अच्छा था कि तैयारी ठीक ठाक थी और हिन्दी में अपना हाथ तंग नहीं था-वरना बाबा जी ने तो बजवा ही दिया था हिन्दी में घंटा। पेपर अच्छा ही हुआ...।
इस वाक्ये के बाद बाबा जी के पास हमारा जाना धीरे धीरे छूट गया। कई वजहों से। लेकिन,यह मानने को अभी भी मन नहीं करता कि वो फ्रॉड थे।
हां, कुछ ज्ञानी टाइप के लोगों ने बाद में कहा-बाबा जी के पास एक जिन्न था, जो भूत की बातें तो खोज लाता था, पर कल क्या होगा-इसमें जिन्न की भी हवा निकल जाती।
अब कोई कुछ भी सोचे-लेकिन दो बातें साफ हैं। पहली बात ये कि बाबा जी ने कई बातें बिलकुल ठीक बताई थीं, इसलिए उऩ पर यकीं हो गया। दूसरी बात ये कि अगर धोखे में भी हम अगर बाबा जी पर ही पूरा यकीं कर लेते तो 12वीं में हमारा हिन्दी में ही घंटा बज जाता। जी हां-हिन्दी। जिसमें किसी का घंटा नहीं बजता। साइंस,मैथ्स में तो दुनिया का घंटा बजता है,हमारा पहली बार हिन्दी में बज गया होता।
-पीयूष
मंगलवार, 1 मई 2007
यूपी बोर्ड धन्य हो !
सीबीएसई के नतीजे आने वाले हैं। सुना है, बहुत पढ़ाई करनी पड़ती है, तब जाकर सीबीएसई बोर्ड के बच्चे 80-90 फीसदी अंक ला पाते हैं। बड़ी मारा मारी है जनाब । लेकिन, अपन तो ठहरे देहाती- वो भी यूपी बोर्ड वाले।
भइया, किस्सा यूं याद आ गया, जब एक सीबीएसई बोर्ड वाले बच्चे को रिलज्ट के तनावग्रस्त हुए देखा। बहरहाल, अपन को भरोसा है कि वो पास हो जाएगा। दिक्कत यह है कि बच्चे पास नहीं होना चाहते, नंबरों में छप्पर फाड़ देना चाहते हैं। अगर 100 से भी ज्यादा नंबर लाने के लिए कोई ट्यूशन शुरु हो जाए तो बच्चे वहां भी जाने लगें।
बहरहाल,अपना किस्सा तो पास होने वाला है। यूपी बोर्ड के दसवीं के इम्तिहान के नतीजे आने को थे। उन दिनों अख़बार में रिजल्ट प्रकाशित होता था। नेट-फेट कुछ नहीं था। ये सुविधा नहीं थी कि चुप्पे से रिलल्ट देखा और चादर तान के सो गए। तब तो पूरा मोहल्ला अखबार के पीछे दौड़ता था, और उसी वक्त झंडा गढ़ जाता था या उखड़ जाता था।
कल्याण सिंह ने नकल नहीं होने दी थी-लिहाजा सारे शेर ढक्कन हो लिए थे। अपन नकलची नहीं थे (कम से कम 12वीं तक) -लेकिन माहौल में इतना टेरर था कि फेल होने की पूरी आशंका थी। नतीजे वाला अखबार कानपुर से औरेया पहुंच चुका था। अपने चेहरे पर झूठी मुस्कुराहट तैर रही थी। पिता जी ने आश्वासन दिया- कुंभ का मेला नहीं है,जो....कोई बात नहीं-फेल हो गए तो भी कोई बात नहीं...
इस आश्वासन से बल मिला लेकिन डर के मारे दिल धक धक कर रहा था। पर यूपी बोर्ड धन्य हो....। यूपी बोर्ड के इतिहास में महज 14 फीसदी रिजल्ट आया और अपन पास हो गए। सेकेन्ड डिवीजन।
लेकिन,यूपी बोर्ड की सही मायने में उदारता 12वीं के इम्तिहान के दौरान दिखायी पड़ी। अपन मैथमेटेक्सि के छात्र थे। हालांकि, आज पूरे ब्लॉग जगत के सामने यह स्वीकार करता हूं कि अगर गणित का मतलब महज बीजगणित होता तो नंबरों में चंद गोल बीज से ज्यादा कभी कुछ नसीब नहीं होते। लेकिन, भगवान ने ही अंकगणित भी बनायी है। खैर, अपन मैथमेटिक्सि के छात्र थे। फिजिक्स-कैमिस्ट्री भी थी। गुमान था कि भौतिक विज्ञान में झंडा गाढ देंगे। हिन्दी-अंग्रेजी तारणहार बनेंगी। कैमिस्ट्री ठीक ठाक है ही और गणित में भी 45-50 नंबर आ ही जाएंगे।
हिन्दी-अग्रेजी और कैमिस्ट्री के पेपर ठीक ठाक निपट लिए। लेकिन,फिजिक्स का पेपर उतना शानदार नहीं हुआ-जितना सोचा था। लगा, अब फर्स्ट डिवीजन नहीं आएगी। मूड उखड़ गया तो अपन भी उखड़ लिए। सोचा, अब पेपर ही नहीं देने। ड्रॉप । फिर खयाल आया कि इम्तिहान देने नहीं पहुंचे तो घर पर पता चल जाएगा। मोहल्ले के लड़के सारा प्लान गुड़गोबर कर देंगे-सो तय किया कि पेपर देने पहुंचेगे पर लिखेंगे कुछ नहीं।
इसी दौरान,दोस्तों से बात हुई तो हमने कह डाला-"अपना पास होना तो मुश्किल है"
मजे की बात देखिए, एक दोस्त ने हम पर भरोसा जताया और बोला-"ऐसा हो नहीं सकता"
इस बात पर एक किलो रमाकांत की मिठाई की शर्त लग गई। हमने सोचा-चलो फेल होंगे, लेकिन मिठाई तो पक्की हो ही गई।
आखिरी इम्तिहान गणित का था। गणित में तीन पेपर होते थे। हमने पहले पेपर में कुछ नहीं लिखा अलबत्ता दो-चार सवाल आते थे तो उन्हें हल कर दिया। तीन घंटे बैठे रहे और चलते चलते सब सवाल काट कर "रफ" लिख डाला। दूसरे पेपर में भी यही खेल किया। तीसरे पेपर के साथ इंटर की परीक्षाएं खत्म होनी थी। खूब नकल हुई। दोस्त-यारों ने खाली बैठा देख कहा- क्या चाहिए, कौन सा सवाल...बताओ? अपन ने कहा, नहीं भाई, हो गया।
नतीजे आए, तो अपन उतने तनावग्रस्त नहीं थे। इस बार मालूम था कि फेल होना है। घर पर कोई कुछ न कहे, इसलिए घर पर भी ऐलान कर दिया कि फेल होना तय है।
लेकिन,धन्य हो यूपी बोर्ड। खुदा जाने किन मास्साब ने कॉपी जांची? उन रफ सवालों पर भी अंक दे डाले और गणित में चार ग्रेस मार्क्स के साथ हमें पास कर डाला। कुल अंक आए 50 फीसदी।
यूपी बोर्ड की इसी महिमा ने हमें पत्रकार बना दिया.....कैसे..यह किस्सा फिर कभी। हां, रिजल्ट आते ही एक किलो मिठाई खाने वो साला दोस्त भी फौरन टपक पड़ा था।
-पीयूष
भइया, किस्सा यूं याद आ गया, जब एक सीबीएसई बोर्ड वाले बच्चे को रिलज्ट के तनावग्रस्त हुए देखा। बहरहाल, अपन को भरोसा है कि वो पास हो जाएगा। दिक्कत यह है कि बच्चे पास नहीं होना चाहते, नंबरों में छप्पर फाड़ देना चाहते हैं। अगर 100 से भी ज्यादा नंबर लाने के लिए कोई ट्यूशन शुरु हो जाए तो बच्चे वहां भी जाने लगें।
बहरहाल,अपना किस्सा तो पास होने वाला है। यूपी बोर्ड के दसवीं के इम्तिहान के नतीजे आने को थे। उन दिनों अख़बार में रिजल्ट प्रकाशित होता था। नेट-फेट कुछ नहीं था। ये सुविधा नहीं थी कि चुप्पे से रिलल्ट देखा और चादर तान के सो गए। तब तो पूरा मोहल्ला अखबार के पीछे दौड़ता था, और उसी वक्त झंडा गढ़ जाता था या उखड़ जाता था।
कल्याण सिंह ने नकल नहीं होने दी थी-लिहाजा सारे शेर ढक्कन हो लिए थे। अपन नकलची नहीं थे (कम से कम 12वीं तक) -लेकिन माहौल में इतना टेरर था कि फेल होने की पूरी आशंका थी। नतीजे वाला अखबार कानपुर से औरेया पहुंच चुका था। अपने चेहरे पर झूठी मुस्कुराहट तैर रही थी। पिता जी ने आश्वासन दिया- कुंभ का मेला नहीं है,जो....कोई बात नहीं-फेल हो गए तो भी कोई बात नहीं...
इस आश्वासन से बल मिला लेकिन डर के मारे दिल धक धक कर रहा था। पर यूपी बोर्ड धन्य हो....। यूपी बोर्ड के इतिहास में महज 14 फीसदी रिजल्ट आया और अपन पास हो गए। सेकेन्ड डिवीजन।
लेकिन,यूपी बोर्ड की सही मायने में उदारता 12वीं के इम्तिहान के दौरान दिखायी पड़ी। अपन मैथमेटेक्सि के छात्र थे। हालांकि, आज पूरे ब्लॉग जगत के सामने यह स्वीकार करता हूं कि अगर गणित का मतलब महज बीजगणित होता तो नंबरों में चंद गोल बीज से ज्यादा कभी कुछ नसीब नहीं होते। लेकिन, भगवान ने ही अंकगणित भी बनायी है। खैर, अपन मैथमेटिक्सि के छात्र थे। फिजिक्स-कैमिस्ट्री भी थी। गुमान था कि भौतिक विज्ञान में झंडा गाढ देंगे। हिन्दी-अंग्रेजी तारणहार बनेंगी। कैमिस्ट्री ठीक ठाक है ही और गणित में भी 45-50 नंबर आ ही जाएंगे।
हिन्दी-अग्रेजी और कैमिस्ट्री के पेपर ठीक ठाक निपट लिए। लेकिन,फिजिक्स का पेपर उतना शानदार नहीं हुआ-जितना सोचा था। लगा, अब फर्स्ट डिवीजन नहीं आएगी। मूड उखड़ गया तो अपन भी उखड़ लिए। सोचा, अब पेपर ही नहीं देने। ड्रॉप । फिर खयाल आया कि इम्तिहान देने नहीं पहुंचे तो घर पर पता चल जाएगा। मोहल्ले के लड़के सारा प्लान गुड़गोबर कर देंगे-सो तय किया कि पेपर देने पहुंचेगे पर लिखेंगे कुछ नहीं।
इसी दौरान,दोस्तों से बात हुई तो हमने कह डाला-"अपना पास होना तो मुश्किल है"
मजे की बात देखिए, एक दोस्त ने हम पर भरोसा जताया और बोला-"ऐसा हो नहीं सकता"
इस बात पर एक किलो रमाकांत की मिठाई की शर्त लग गई। हमने सोचा-चलो फेल होंगे, लेकिन मिठाई तो पक्की हो ही गई।
आखिरी इम्तिहान गणित का था। गणित में तीन पेपर होते थे। हमने पहले पेपर में कुछ नहीं लिखा अलबत्ता दो-चार सवाल आते थे तो उन्हें हल कर दिया। तीन घंटे बैठे रहे और चलते चलते सब सवाल काट कर "रफ" लिख डाला। दूसरे पेपर में भी यही खेल किया। तीसरे पेपर के साथ इंटर की परीक्षाएं खत्म होनी थी। खूब नकल हुई। दोस्त-यारों ने खाली बैठा देख कहा- क्या चाहिए, कौन सा सवाल...बताओ? अपन ने कहा, नहीं भाई, हो गया।
नतीजे आए, तो अपन उतने तनावग्रस्त नहीं थे। इस बार मालूम था कि फेल होना है। घर पर कोई कुछ न कहे, इसलिए घर पर भी ऐलान कर दिया कि फेल होना तय है।
लेकिन,धन्य हो यूपी बोर्ड। खुदा जाने किन मास्साब ने कॉपी जांची? उन रफ सवालों पर भी अंक दे डाले और गणित में चार ग्रेस मार्क्स के साथ हमें पास कर डाला। कुल अंक आए 50 फीसदी।
यूपी बोर्ड की इसी महिमा ने हमें पत्रकार बना दिया.....कैसे..यह किस्सा फिर कभी। हां, रिजल्ट आते ही एक किलो मिठाई खाने वो साला दोस्त भी फौरन टपक पड़ा था।
-पीयूष
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