रविवार, 6 मई, 2007

जब बाबा जी बजवा देते हिन्दी में घंटा !

तुम्हारी मौसी मुंबई में हैं।
तुम्हारे जन्म की तारीख फलां है।
तुम्हारे घर में ऐसा उपकरण आऩे वाला है,जो पूरे कस्बे में अभी नहीं है।
बेटी, तुम्हारे पति आज बैंक नहीं गए।

बाबा जी की हर बात सही निकली। चमत्कार को नमस्कार करना ही पड़ा।

ये बात सन् 1993 की है शायद। उन दिनों हमारी जान-पहचान एक बाबा जी से हुई। बाबा जी भले इंसान थे, कभी कुछ मांगा नहीं-लिया नहीं।

खास बात ये कि हमारे बारे में,हमारे पड़ोसियों के बारे में बतायी बातें सच निकलीं। हमने अपने रिश्तेदारों को भी दिल्ली-कानपुर-आगरा से आऩे का न्यौता दे डाला। भइए, बाबा जी चमत्कारी टाइप के हैं, पूछ सको तो पूछ।

वैसे, मैं ईमानदारी से कहता हूं कि उन्होंने कुछ बातें ऐसी बतायीं-जो शायद मेरे अलावा किसी और को नहीं मालूम होंगी।

ज़ाहिर है, बाबा जी ने अपने प्रभावित कर रखा था। औरेया के उन बाबा जी का नाम याद नहीं, क्योंकि हम उन्हें बाबा जी ही कहते थे, लेकिन लगातार उनसे संपर्क होने के कारण उनका हमारे मुहल्ले में आना-जाना सामान्य हो गया था। उनके मुरीदों की संख्या लगातार बढ़ रही थी-और कोई ऐसा शख्स नहीं मिला था-जो कहे कि बाबा फ्रॉड हैं।

इन्हीं दिनों, हमारे इंटर के पेपर नजदीक आ गए। पहला पेपर हिन्दी का था। लालच बुरी बला है-और हम लालची नहीं, ऐसा भी नहीं। मन मे खयाल आया कि अगर बाबा जी चमत्कार से सवाल बता दें तो मज़ा आ जाए। लफड़े खत्म।

हमनें ये दिली ख्वाहिश बाबा जी को बतायी तो उन्होंने भी कह डाला- पेपर से एक दिन पहले आना।

भइए, हम और हमारा दोस्त पेपर से ऐन पहले के दिन शाम को बाबा जी के पास पहुंच गए। बाबा जी ने किताब में 10-12 सवालों पर टिक मार्क लगा दिया। हमने सोचा कि वाह बेटा! हो गया खेल! अब तो झंडा गढ जाएगा। दरअसल, बाबा जी पर अविश्वास करने का कोई ठोस कारण नहीं था।

रात में इम्तिहान की आखिरी तैयारी में जुटे तो उन सवालों को ठोक-बजाकर समझ लिया-जिन्हें बाबा जी ने बताया था। लेकिन, पहला पेपर था और अपन अक्ल से बिलकुल चिरकुट नहीं थे ( थोड़े तो थे ही, तभी गए थे बाबा जी के पास)-लिहाजा बाकी तैयारी भी कर डाली।

इम्तिहान वाले दिन अपनी दोस्ती का हक अदा करने के लिए कुछ दोस्तों को बाबाजी मार्का सवाल आउट कर डाले। भाई, यारी का सवाल है।हम 100 नंबर लाएं, अपना दोस्त 60 भी नहीं- ये अच्छी बात नहीं है। सो, दोस्तों को कुछ सवाल ये कहकर बता डाले कि भइए,बहुत इंपोर्टेंट सवाल है-किसी हिन्दी के विद्वान अंकल ने बताए हैं।

लेकिन, पर्चा आया तो एक पल के लिए हवाइयां उड़ गईँ। बाबा जी पूरी तरह फेल। एक सवाल नहीं गिरा साला पर्चे में उऩका। वो तो अच्छा था कि तैयारी ठीक ठाक थी और हिन्दी में अपना हाथ तंग नहीं था-वरना बाबा जी ने तो बजवा ही दिया था हिन्दी में घंटा। पेपर अच्छा ही हुआ...।

इस वाक्ये के बाद बाबा जी के पास हमारा जाना धीरे धीरे छूट गया। कई वजहों से। लेकिन,यह मानने को अभी भी मन नहीं करता कि वो फ्रॉड थे।

हां, कुछ ज्ञानी टाइप के लोगों ने बाद में कहा-बाबा जी के पास एक जिन्न था, जो भूत की बातें तो खोज लाता था, पर कल क्या होगा-इसमें जिन्न की भी हवा निकल जाती।

अब कोई कुछ भी सोचे-लेकिन दो बातें साफ हैं। पहली बात ये कि बाबा जी ने कई बातें बिलकुल ठीक बताई थीं, इसलिए उऩ पर यकीं हो गया। दूसरी बात ये कि अगर धोखे में भी हम अगर बाबा जी पर ही पूरा यकीं कर लेते तो 12वीं में हमारा हिन्दी में ही घंटा बज जाता। जी हां-हिन्दी। जिसमें किसी का घंटा नहीं बजता। साइंस,मैथ्स में तो दुनिया का घंटा बजता है,हमारा पहली बार हिन्दी में बज गया होता।
-पीयूष

गुरुवार, 3 मई, 2007

जब छिड़ गई लड़की नादानी में

"वो और मैं सामने थे। आंखों में आंखे। कई निगाहें इस हरकत पर जमी बैठी थी। अचानक उसकी कलाई हमने थाम ली। पूरा मोहल्ला सन्न। कब क्या होगा ?"

भइए, यह कहानी भी अपनी ही ज़िंदगी का किस्सा है। इस किस्से में रोमांच तो बहुत है-लेकिन हमें अफ़सोस भी है। दरअसल, ज़िंदगी में इकलौती बार हमने (गलती से ही सही) लड़की छेड़ दी। वो भी सरेबाज़ार।

अब, क्यों और कैसे हुआ यह वाक्या-इससे पहले एक फ्लैश बैक-

बाहरवीं में 50 फीसदी नंबर लेकर अपन पास तो हो गए- लेकिन ख्वाब था कि आगरा के सेंट जॉस कॉलेज में दाखिला मिले। शायद, यह ख्वाब जिद में तब्दील हो चुका था-लिहाजा औरेया में एडमिशन लिया नहीं और सेंट जॉंस में एडमिशन मिला नहीं। हां, भाई-बंधु लगातार यह आश्वासन दिलाते रहे कि बस,अब हुआ कि तब हुआ। लेकिन, नहीं हुआ। जिद में एक साल बर्बाद कर लेने से पिताजी और हममें शीत युद्ध छिड़ गया। उनके सुबह दफ़्तर निकलने से पहले अपन घर से निकल जाते। दोस्त की दुकान पर अख़बार चाटते और जलेबी-समोसे खिलाने का ऑर्डर देते। दोपहर में दो-तीन घंटे की नींद निकालने के बाद शाम को बापू के घर लौटने से पहले फिर निकल लेते। इस बीच, इक्का-दुक्का बार पिता से सामना हो गया-तो युद्ध तय। भाई, जब बाप से युद्ध कर बैठे हो-तो पैसे मांगने में भी बेइज्जती लगती। ये युद्ध करीब दो महीने चला।

इसी दौरान, एक दिन अपन दिल्ली से औरेया लौटे। मेन बाज़ार स्थित दोस्त की दुकान पर पहुंचे तो मोहल्ले के तमाम यार-दोस्तों ने हड़काना शुरु कर दिया। दरअसल, उसी वक्त वही बालिका ट्यूशन पढ़कर वहां से गुजरने वाली थी-जिसके साथ हमारा नाम काफी वक्त तक जोड़ा गया (इसी बालिका से जुड़ा पुराना किस्सा)। हमें पता नहीं था-लेकिन कहां मानने वाले थे। उनका कहना था कि हम ठीक पांच बजे वहां पहुंचे ही इसलिए हैं क्योंकि बालिका गुजरने वाली है।

बहरहाल,दोस्तों ने गालियां देनी शुरु कीं। "साले कुछ नहीं कर सकते। एक लड़की से कभी दो शब्द तक नहीं बोल पाए -जिंदगी में क्या खाक कुछ करोगे"...वगैरह वगैरह।

जवानी की दहलीज पर कदम रखा था-तो खून को उबाल मारना ही था। अपन ने भी जोश में कह डाला-शर्त लगाओ तो बात करके दिखाते हैं।

शर्त सुनकर हमारा एक दोस्त भी ताव खा गया। उसने भी आव देखा न ताव, जेब में 800 रुपये निकालर पटक दिए। कहा-रही आठ सौ रुपये की शर्त।

मर्द की जुबां थी-पीछे हटना मुश्किल था। मोहल्ले के तमाम तुर्रम खां वहां जमा थे। बात से पलटना नामुमकिन-सो जींस को कसा और कहा-ठीक है,पूरी शर्त बताओ।

शर्त तय हुई -सिर्फ बात करके दिखाना है। मेरी कोई भी बात का लड़की ने जवाब दिया तो शर्त जीता-नहीं दिया तो हारा। लेकिन, यह तय कैसे होगा? इसके लिए, चार-छह मित्र अलग अलग एंगल से खड़े हो लिए।

अब,वो ऐतिहासिक पल आ गया....। ट्यूशन छूटा तो बालिका तमाम सहेलियों के साथ निकल पड़ी। धड़कन 500 किलोमीटर की रफ्तार से दौड़ कर रही थी। पीछे हटना मुश्किल था-लेकिन कदम आगे भी नहीं बढ रहे थे। जो लड़की सैकड़ों बार गली में अकेले मिली हो-तब उससे बात नहीं कर पाए हों, उससे पूरे मोहल्ले के सामने,उसकी सहेलियों के बीच कैसे बात मुमकिन है? लेकिन, करें तो क्या। बजरंगबली का नाम लिया और चल दिए किला फतह करने।

हमने बिलकुल पास पहुंचकर जैसे ही उसे उसके नाम से पुकारा....एक झटके में सभी लड़कियों ने पलट कर मेरी तरफ देखा। लेकिन,जनाब मुश्किल में कोई किसी का साथ नहीं देता। सो यहां भी हुआ। बालिका की तमाम सहेलियां उसका साथ छोड़कर आगे चलती बनी, सिर्फ एक को छोड़कर। लेकिन,जब अपन ने कहा- मुझे तुमसे कुछ बात करनी है, तो वो भी निकल ली।
अब तक मोहल्ले के हर आदमी की नज़रें हम पर टिक चुकीं थी।

संवाद शुरु-

ए, मुझे तुमसे कुछ बात करनी है...

उसने करीब चार सेकेंड मुझे देखा.....लगा कि जवाब देगी-लेकिन वो तो चल पड़ी आगे...
अचानक उसे आगे बढ़ता देख हमारी जुबां ने काम करना बंद कर दिया। खुदा जाने कैसे हमारा हाथ उठा-और उसकी कलाई थाम ली।

"वो और मैं सामने थे। आंखों में आंखे। कई निगाहें इस हरकत पर जमी बैठी थी। अचानक उसकी कलाई हमने थाम ली। पूरा मोहल्ला सन्न। कब क्या होगा ?"

लेकिन,उसने धीरे से जवाब दिया- पीयूष तुम पागल हो गए हो क्या? छोड़ो मुझे।
उसने जवाब दिया-तो हाथ छूट गया।

अपन शर्त जीत गए-लेकिन कई लोगों का भरोसा हार गए। इस हरकत के बाद पिटना भी तय था। लेकिन,मालूम था कि शिकायत सुबह होगी-सो रात में ही सीएस का फॉर्म लेने की बात कही और सुबह पांच बजे कानपुर निकल पड़े।

रात के डेढ़ बजे लौटे तो शिकायत हो चुकी थी। पिता जी ने कुछ नहीं कहा-लेकिन मां ने खूब खरी-खोटी सुनाई। अगले दिन-बापू ने फरमान सुनाया- आइंदा ऐसी हरकत न हो-और उस गली में अब मत जाना।

चौदह-पंद्रह साल हो गए-अपन उस गली में नहीं गए।

-पीयूष

मंगलवार, 1 मई, 2007

यूपी बोर्ड धन्य हो !

सीबीएसई के नतीजे आने वाले हैं। सुना है, बहुत पढ़ाई करनी पड़ती है, तब जाकर सीबीएसई बोर्ड के बच्चे 80-90 फीसदी अंक ला पाते हैं। बड़ी मारा मारी है जनाब । लेकिन, अपन तो ठहरे देहाती- वो भी यूपी बोर्ड वाले।

भइया, किस्सा यूं याद आ गया, जब एक सीबीएसई बोर्ड वाले बच्चे को रिलज्ट के तनावग्रस्त हुए देखा। बहरहाल, अपन को भरोसा है कि वो पास हो जाएगा। दिक्कत यह है कि बच्चे पास नहीं होना चाहते, नंबरों में छप्पर फाड़ देना चाहते हैं। अगर 100 से भी ज्यादा नंबर लाने के लिए कोई ट्यूशन शुरु हो जाए तो बच्चे वहां भी जाने लगें।

बहरहाल,अपना किस्सा तो पास होने वाला है। यूपी बोर्ड के दसवीं के इम्तिहान के नतीजे आने को थे। उन दिनों अख़बार में रिजल्ट प्रकाशित होता था। नेट-फेट कुछ नहीं था। ये सुविधा नहीं थी कि चुप्पे से रिलल्ट देखा और चादर तान के सो गए। तब तो पूरा मोहल्ला अखबार के पीछे दौड़ता था, और उसी वक्त झंडा गढ़ जाता था या उखड़ जाता था।

कल्याण सिंह ने नकल नहीं होने दी थी-लिहाजा सारे शेर ढक्कन हो लिए थे। अपन नकलची नहीं थे (कम से कम 12वीं तक) -लेकिन माहौल में इतना टेरर था कि फेल होने की पूरी आशंका थी। नतीजे वाला अखबार कानपुर से औरेया पहुंच चुका था। अपने चेहरे पर झूठी मुस्कुराहट तैर रही थी। पिता जी ने आश्वासन दिया- कुंभ का मेला नहीं है,जो....कोई बात नहीं-फेल हो गए तो भी कोई बात नहीं...

इस आश्वासन से बल मिला लेकिन डर के मारे दिल धक धक कर रहा था। पर यूपी बोर्ड धन्य हो....। यूपी बोर्ड के इतिहास में महज 14 फीसदी रिजल्ट आया और अपन पास हो गए। सेकेन्ड डिवीजन।

लेकिन,यूपी बोर्ड की सही मायने में उदारता 12वीं के इम्तिहान के दौरान दिखायी पड़ी। अपन मैथमेटेक्सि के छात्र थे। हालांकि, आज पूरे ब्लॉग जगत के सामने यह स्वीकार करता हूं कि अगर गणित का मतलब महज बीजगणित होता तो नंबरों में चंद गोल बीज से ज्यादा कभी कुछ नसीब नहीं होते। लेकिन, भगवान ने ही अंकगणित भी बनायी है। खैर, अपन मैथमेटिक्सि के छात्र थे। फिजिक्स-कैमिस्ट्री भी थी। गुमान था कि भौतिक विज्ञान में झंडा गाढ देंगे। हिन्दी-अंग्रेजी तारणहार बनेंगी। कैमिस्ट्री ठीक ठाक है ही और गणित में भी 45-50 नंबर आ ही जाएंगे।

हिन्दी-अग्रेजी और कैमिस्ट्री के पेपर ठीक ठाक निपट लिए। लेकिन,फिजिक्स का पेपर उतना शानदार नहीं हुआ-जितना सोचा था। लगा, अब फर्स्ट डिवीजन नहीं आएगी। मूड उखड़ गया तो अपन भी उखड़ लिए। सोचा, अब पेपर ही नहीं देने। ड्रॉप । फिर खयाल आया कि इम्तिहान देने नहीं पहुंचे तो घर पर पता चल जाएगा। मोहल्ले के लड़के सारा प्लान गुड़गोबर कर देंगे-सो तय किया कि पेपर देने पहुंचेगे पर लिखेंगे कुछ नहीं।

इसी दौरान,दोस्तों से बात हुई तो हमने कह डाला-"अपना पास होना तो मुश्किल है"

मजे की बात देखिए, एक दोस्त ने हम पर भरोसा जताया और बोला-"ऐसा हो नहीं सकता"

इस बात पर एक किलो रमाकांत की मिठाई की शर्त लग गई। हमने सोचा-चलो फेल होंगे, लेकिन मिठाई तो पक्की हो ही गई।
आखिरी इम्तिहान गणित का था। गणित में तीन पेपर होते थे। हमने पहले पेपर में कुछ नहीं लिखा अलबत्ता दो-चार सवाल आते थे तो उन्हें हल कर दिया। तीन घंटे बैठे रहे और चलते चलते सब सवाल काट कर "रफ" लिख डाला। दूसरे पेपर में भी यही खेल किया। तीसरे पेपर के साथ इंटर की परीक्षाएं खत्म होनी थी। खूब नकल हुई। दोस्त-यारों ने खाली बैठा देख कहा- क्या चाहिए, कौन सा सवाल...बताओ? अपन ने कहा, नहीं भाई, हो गया।

नतीजे आए, तो अपन उतने तनावग्रस्त नहीं थे। इस बार मालूम था कि फेल होना है। घर पर कोई कुछ न कहे, इसलिए घर पर भी ऐलान कर दिया कि फेल होना तय है।

लेकिन,धन्य हो यूपी बोर्ड। खुदा जाने किन मास्साब ने कॉपी जांची? उन रफ सवालों पर भी अंक दे डाले और गणित में चार ग्रेस मार्क्स के साथ हमें पास कर डाला। कुल अंक आए 50 फीसदी।

यूपी बोर्ड की इसी महिमा ने हमें पत्रकार बना दिया.....कैसे..यह किस्सा फिर कभी। हां, रिजल्ट आते ही एक किलो मिठाई खाने वो साला दोस्त भी फौरन टपक पड़ा था।

-पीयूष

रविवार, 29 अप्रैल, 2007

कार में भूत !

आपकी कार में अगर भूत बैठ जाए तो क्या होगा? इस वक्त आप क्या करेंगे ?

जनाब होना क्या है। आपकी सिट्टी पिट्टी गुम हो जाएगी। इस वक्त आपको क्या करना है, जो करना है वो तो भूत को करना है।

भईया, दो दिन पहले मेरे साथ तो कुछ ऐसा ही हुआ। दरअसल, कार ड्राइव करते हुए हम अपने दफ़्तर जा रहे थे। जैसा हमेशा होता है कि जब आपको कहीं जल्दी पहुंचना होता है, आप लेट होते हैं, वैसा ही मेरे साथ हुआ। हुआ यूं कि अचानक कार के स्टीरियो ने रंग दिखाना शुरु कर दिया। गाना अपने आप बजता, फिर बंद हो जाता। लगभग चार मिनट के इस ड्रामे के बाद अपन इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि स्टीरियो का तार कुछ गड़बड़ हो गया है। लेकिन, ये क्या? इस निष्कर्ष पर पहुंचते ही हमारी कार का पावर स्टीयरिंग एकदम ट्रक के स्टीयरिंग सरीखा भारी हो गया। भारी ट्रैफिक के बीच ट्रक ( भारी कार) चलाने का अनुभव लिया ही था कि एकदम मोड़ पर इंडीगेटर दगा दे गया। कुछ देर पहले तक अच्छे-खासे जल रहे इंडीगेटर ने काम करना बंद कर दिया।
इन हरकतों के बीच वास्तव में एक पल को मुझे लगा कि कार में कोई भूत-वूत तो नहीं आ गया है? अपन ने गाड़ी रोकी तो कार का दरवाजा भी कुछ पंगा करने लगा। बहरहाल, कार से निकलकर जांच ( अल्प ज्ञान के बूते) की तो कुछ समझ नहीं आया-लेकिन दोबारा कार स्टार्ट करने की कोशिश की तो वो स्टार्ट नहीं हुई। अब खड़े रहो घोंचू से...।

बहरहाल,मारुति हेल्प लाइन पर फोन करने के बाद मैकेनिक आया-उसने गाड़ी शुरु की और हम अपने दफ्तर पहुंचे। इस बीच, इन भूतहा हरकतों का राज़ फाश हुआ। वो यह कि कार की बैटरी के प्राण पखेरु होने को है....।

लिजिए लग गया चूना ढाई-तीन हज़ार रुपये का.....।

-पीयूष

शुक्रवार, 27 अप्रैल, 2007

"मुझे गुप्त रोग हुआ है"

"मुझे गुप्त रोग हुआ है"- दरअसल, ये स्टेटमेंट ही 1000 वोल्ट के करंट वाला है। लेकिन, साहब घबराने की बात नहीं-ये महज़ एक किस्सा है। किस्सा ऐसा-जिसने हमें भी कभी जोरदार करंट लगाया था।

बात कई साल पुरानी है। हम अपने परिवार समेत घर में बैठे गप्पबाजी कर रहे थे कि एक कज़िन की तबियत कुछ नासाज़ दिखायी दी। वो बालक उस वक्त करीब छह-सात साल का रहा होगा। हमने उससे पूछा कि- तबियत को क्या हुआ? उसने सीधे सीधे जवाब दे डाला-"मुझे गुप्त रोग हुआ है।"

उसके इस बयान को सुनकर वहां बैठे तमाम लोगों को एक पल के लिए मानों सांप सूंघ गया। सात-आठ साल का बच्चा यह क्या कह रहा है। लेकिन,जब इस गुप्त रोग का खुलासा हुआ-तो सभी ने पेट पकड़कर हंसना शुरु कर दिया। दरअसल,बालक के कहने का मतलब यह था कि उसकी तबियत किस वजह से नासाज़ है-यह उसे भी नहीं पता अलबत्ता तबियत कुछ गड़बड़ जरुर है। बस, इस गुप्त टाइप की बीमारी को उसने गुप्त रोग कह डाला। वैसे, इस शब्द "गुप्त रोग" के बारे में बालक ने तीन दिन पहले ही कानपुर से दिल्ली आते वक्त ट्रेन में बैठे बैठे दीवारों पर पढ़ा था।

विज्ञापनों की भाषा हमेशा से बच्चों के दिल पर असर डालती रही है। इस बात की तस्दीक यह किस्सा भी करता है और इससे पहले वाला किस्सा भी,जिसमें मैंने बताया था कि कैसे मेरे बालक ने कार्टून की भाषा का इस्तेमाल करते हुए हमें सरेबाजार लुच्चा साबित कर डाला था।

-पीयूष

मंगलवार, 24 अप्रैल, 2007

वो बच्चा अपन लुच्चा

बच्चों की जुबां बदल गई है। बच्चे भले ही अभी भी मन के सच्चे हो, लेकिन कभी कभी हरकत ऐसी कर डालते हैं कि आप दीन-दुनिया के सामने लुच्चे साबित हो जाते हैं।

चंद रोज़ पहले की बात है। हम अपने साहबजादे को लेकर अपना स्टेटस बढ़ाने (खरीदने की औकात नहीं,पर एक दो पॉलिथीन टांग लो ताकि लगे कुछ खरीदा है) मॉल घूमने पहुंचे। साहबजादे अभी अभी तीन साल के हुए हैं और उनकी जुबां में तुतलाना बचा हुआ है। बहरहाल, मॉल में उनका इंटरेस्ट घूमना नहीं बल्कि झूले झूलना, बैटरी वाली कार चलाना वगैरह मे होता है। शनिवार के दिन दो बार पांच पांच मिनट कार में चक्कर लगाने के बाद जब जनाब के उतरने की बारी आयी तो साहब रोने लगे। हमने कहा-भइया, 100 रुपये ढीले हो गए हैं, अब आओ कुछ आइसक्रीम-वाइसक्रीम खाकर घर चलते हैं। लेकिन, जनाब टस से मस नहीं। हमारे बाप ने हमें कभी नहीं मारा तो इस परंपरा पर अपन भी टिके हुए हैं। लेकिन जनाब हमने थोड़ी आंखें क्या तरेरी ग़ज़ब हो गया।

भाई साहब ने पचासों लोगों की मौजूदगी में हमारे सामने हाथ जोड़ लिए और कहने लगा-"पापा, मुझे माफ कर दो, पापा मुझे माफ कर दो।" ये ऐतिहासिक दृश्य देखकर अपना खून सूख गया।
हाईप्रोफाइल लोग अपन जैसे टुच्चे आदमी की तरफ घूरे जा रहे थे-लेकिन बालक की शताब्दी स्पीड वाली जुबां से लगातार निकले जा रहा था-"पापा मुझे माफ कर दो "। कभी बच्चे को मारा नहीं और न इस बार ऐसी कोई गुंजाइश थी-फिर ऐसा क्यों ?


बहरहाल, ज़ालिम ज़माने के सामने बच्चे को बहलाया-फुसलाया और फौरन कार में दो चक्कर और लगवाए।

लेकिन, इस हरकत के पीछे का सच कुछ दिन पहले पता चला,जब हम बालक के साथ टीवी पर कार्टून देख रहे थे। इस दौरान, हमें बहुत से वो शब्द सुनायी दिए-जो हमारा बालक अब बड़बड़ाने लगा है। इसी में एक कार्टून करेक्टर बोला भी- "मुझे माफ कर दो- मुझे माफ कर दो"।

अपने समझ में आ गया था कि कार्टून ने बच्चों की भाषा बदल दी है।

वैसे,परसो बालक हमारे साथ खेलते हुए अचानक चिल्लाया- "कोई मेरी हेल्प करेगा"। इस बार हमें कोई आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि वास्तव में,कार्टून फिल्मों ने बच्चों की जुबां बदल डाली है।

-पीयूष

सोमवार, 16 अप्रैल, 2007

या अल्लाह, मज़ाक में मिट गई मुहब्बत

आप हंसते हैं-मुस्कुराते हैं, हमेशा हल्की फुल्की बातें करते हैं ताकि लोगों को खुश रख सकें तो यह भी ठीक नहीं। आप विदूषक नहीं है,आप बेहतरीन स्टूडेंट भी हैं लेकिन आपकी बातें लोगों को गुदगुदाती हैं तो ये भी ठीक नहीं।

भईया, ये मूल्यवान अनुभव में हमनें अपनी ही ज़िंदगी से सीखा है। किस्सा करीब 10 साल पुराना है। कॉलेज के दिनों में एक बालिका(A) हमें अच्छी लगने लगी। हमारी उससे गहरी दोस्ती हो गई।

क्रमश:

एक मच्छर आदमी को हिजड़ा बना देता है
एक लड़की का हाल पूछना दूसरी से बेगाना बना देता है...

आगे बढ़े:

तो जनाब हुआ यों कि इस बालिका की एक खास सहेली(B) भी थी। हमारी भी वो अच्छी मित्र थी-लेकिन लगातार दो दिन वो क्लास में नहीं आयी तो हमने अपनी गहरी दोस्त से पूछ डाला-"क्या बात है...वो(B) क्यों नहीं आ रही।"

वैसे, आपकी किस्मत अगर लुढ़िस(शब्द पर गौर फरमाएं) हो तो आप ऐसी हरकत कर डालते हैं कि मुहब्बत पर पानी फिर ही जाता है। एक दिन तमाम दोस्तों के बीच B ने कहा कि उसे हक़ीकत फिल्म का एक गाना बहुत पसंद है-लेकिन वो कैसेट कहीं नहीं मिलती। अपनी किस्मत खराब थी कि अगले ही दिन एक दुकान पर हम पहुंचे कि हकीकत फिल्म की वो कैसेट हमें मिल गईं। हमने खरीदी और B को भेंट कर दी। अब,हमें क्या पता था कि इस भेंट का गलत अर्थ निकाल लिया जाएगा।

बहरहाल, कहानी के इस दौर में एक दिन अचानक A ने कहा कि उसे हमसे कोई बहुत ज़रुरी बात करनी है। हमनें सोचा कि चलो...कुछ प्यारभरी इनकी भी सुन लेते हैं।

लेकिन,A ने तो पूरी कहानी का ऐसा पलीता किया कि क्या बताएं। A ने हमसे कहा कि अगर B तुम्हें पसंद है तो तुम उससे जाकर कहो। क्योंकि,इस तरह के हिंट वहां से भी मिल रहे हैं। अब, अपन ए के चक्कर में- प्रस्ताव बी का मिला तो दिमाग चकरघिन्नी होने लगा। लेकिन,उसी वक्त हमने होश संभाला। सोच लिया कि अगर सीधी सीधी बात नहीं की तो पूरी ज़िंदगी अफ़सोर रहेगा। प्रेम के इज़हार का कोई मौका तो नहीं था लेकिन गंगा उल्टी दिशा में बह जाए-इससे पहले ही कुआँ खोद डालना था। हमनें आवाज़ भारी की और कहा "ए, मैं तुम्हें पसंद करता हूं।" लेकिन,हमें क्या पता था कि पूर्व जन्म में किए पाप मज़ाक-मज़ाक में इतने भारी पड़ेगे कि मुहब्बत ही मेंट डालेंगे। ए ने एक पल हमारे चेहरे को निहारा और फिर ज़ोर से हंसकर बोली-"मजाक मत करो पीयूष"।