तुम्हारी मौसी मुंबई में हैं।
तुम्हारे जन्म की तारीख फलां है।
तुम्हारे घर में ऐसा उपकरण आऩे वाला है,जो पूरे कस्बे में अभी नहीं है।
बेटी, तुम्हारे पति आज बैंक नहीं गए।
बाबा जी की हर बात सही निकली। चमत्कार को नमस्कार करना ही पड़ा।
ये बात सन् 1993 की है शायद। उन दिनों हमारी जान-पहचान एक बाबा जी से हुई। बाबा जी भले इंसान थे, कभी कुछ मांगा नहीं-लिया नहीं।
खास बात ये कि हमारे बारे में,हमारे पड़ोसियों के बारे में बतायी बातें सच निकलीं। हमने अपने रिश्तेदारों को भी दिल्ली-कानपुर-आगरा से आऩे का न्यौता दे डाला। भइए, बाबा जी चमत्कारी टाइप के हैं, पूछ सको तो पूछ।
वैसे, मैं ईमानदारी से कहता हूं कि उन्होंने कुछ बातें ऐसी बतायीं-जो शायद मेरे अलावा किसी और को नहीं मालूम होंगी।
ज़ाहिर है, बाबा जी ने अपने प्रभावित कर रखा था। औरेया के उन बाबा जी का नाम याद नहीं, क्योंकि हम उन्हें बाबा जी ही कहते थे, लेकिन लगातार उनसे संपर्क होने के कारण उनका हमारे मुहल्ले में आना-जाना सामान्य हो गया था। उनके मुरीदों की संख्या लगातार बढ़ रही थी-और कोई ऐसा शख्स नहीं मिला था-जो कहे कि बाबा फ्रॉड हैं।
इन्हीं दिनों, हमारे इंटर के पेपर नजदीक आ गए। पहला पेपर हिन्दी का था। लालच बुरी बला है-और हम लालची नहीं, ऐसा भी नहीं। मन मे खयाल आया कि अगर बाबा जी चमत्कार से सवाल बता दें तो मज़ा आ जाए। लफड़े खत्म।
हमनें ये दिली ख्वाहिश बाबा जी को बतायी तो उन्होंने भी कह डाला- पेपर से एक दिन पहले आना।
भइए, हम और हमारा दोस्त पेपर से ऐन पहले के दिन शाम को बाबा जी के पास पहुंच गए। बाबा जी ने किताब में 10-12 सवालों पर टिक मार्क लगा दिया। हमने सोचा कि वाह बेटा! हो गया खेल! अब तो झंडा गढ जाएगा। दरअसल, बाबा जी पर अविश्वास करने का कोई ठोस कारण नहीं था।
रात में इम्तिहान की आखिरी तैयारी में जुटे तो उन सवालों को ठोक-बजाकर समझ लिया-जिन्हें बाबा जी ने बताया था। लेकिन, पहला पेपर था और अपन अक्ल से बिलकुल चिरकुट नहीं थे ( थोड़े तो थे ही, तभी गए थे बाबा जी के पास)-लिहाजा बाकी तैयारी भी कर डाली।
इम्तिहान वाले दिन अपनी दोस्ती का हक अदा करने के लिए कुछ दोस्तों को बाबाजी मार्का सवाल आउट कर डाले। भाई, यारी का सवाल है।हम 100 नंबर लाएं, अपना दोस्त 60 भी नहीं- ये अच्छी बात नहीं है। सो, दोस्तों को कुछ सवाल ये कहकर बता डाले कि भइए,बहुत इंपोर्टेंट सवाल है-किसी हिन्दी के विद्वान अंकल ने बताए हैं।
लेकिन, पर्चा आया तो एक पल के लिए हवाइयां उड़ गईँ। बाबा जी पूरी तरह फेल। एक सवाल नहीं गिरा साला पर्चे में उऩका। वो तो अच्छा था कि तैयारी ठीक ठाक थी और हिन्दी में अपना हाथ तंग नहीं था-वरना बाबा जी ने तो बजवा ही दिया था हिन्दी में घंटा। पेपर अच्छा ही हुआ...।
इस वाक्ये के बाद बाबा जी के पास हमारा जाना धीरे धीरे छूट गया। कई वजहों से। लेकिन,यह मानने को अभी भी मन नहीं करता कि वो फ्रॉड थे।
हां, कुछ ज्ञानी टाइप के लोगों ने बाद में कहा-बाबा जी के पास एक जिन्न था, जो भूत की बातें तो खोज लाता था, पर कल क्या होगा-इसमें जिन्न की भी हवा निकल जाती।
अब कोई कुछ भी सोचे-लेकिन दो बातें साफ हैं। पहली बात ये कि बाबा जी ने कई बातें बिलकुल ठीक बताई थीं, इसलिए उऩ पर यकीं हो गया। दूसरी बात ये कि अगर धोखे में भी हम अगर बाबा जी पर ही पूरा यकीं कर लेते तो 12वीं में हमारा हिन्दी में ही घंटा बज जाता। जी हां-हिन्दी। जिसमें किसी का घंटा नहीं बजता। साइंस,मैथ्स में तो दुनिया का घंटा बजता है,हमारा पहली बार हिन्दी में बज गया होता।
-पीयूष
रविवार, 6 मई, 2007
जब बाबा जी बजवा देते हिन्दी में घंटा !
गुरुवार, 3 मई, 2007
जब छिड़ गई लड़की नादानी में
"वो और मैं सामने थे। आंखों में आंखे। कई निगाहें इस हरकत पर जमी बैठी थी। अचानक उसकी कलाई हमने थाम ली। पूरा मोहल्ला सन्न। कब क्या होगा ?"
भइए, यह कहानी भी अपनी ही ज़िंदगी का किस्सा है। इस किस्से में रोमांच तो बहुत है-लेकिन हमें अफ़सोस भी है। दरअसल, ज़िंदगी में इकलौती बार हमने (गलती से ही सही) लड़की छेड़ दी। वो भी सरेबाज़ार।
अब, क्यों और कैसे हुआ यह वाक्या-इससे पहले एक फ्लैश बैक-
बाहरवीं में 50 फीसदी नंबर लेकर अपन पास तो हो गए- लेकिन ख्वाब था कि आगरा के सेंट जॉस कॉलेज में दाखिला मिले। शायद, यह ख्वाब जिद में तब्दील हो चुका था-लिहाजा औरेया में एडमिशन लिया नहीं और सेंट जॉंस में एडमिशन मिला नहीं। हां, भाई-बंधु लगातार यह आश्वासन दिलाते रहे कि बस,अब हुआ कि तब हुआ। लेकिन, नहीं हुआ। जिद में एक साल बर्बाद कर लेने से पिताजी और हममें शीत युद्ध छिड़ गया। उनके सुबह दफ़्तर निकलने से पहले अपन घर से निकल जाते। दोस्त की दुकान पर अख़बार चाटते और जलेबी-समोसे खिलाने का ऑर्डर देते। दोपहर में दो-तीन घंटे की नींद निकालने के बाद शाम को बापू के घर लौटने से पहले फिर निकल लेते। इस बीच, इक्का-दुक्का बार पिता से सामना हो गया-तो युद्ध तय। भाई, जब बाप से युद्ध कर बैठे हो-तो पैसे मांगने में भी बेइज्जती लगती। ये युद्ध करीब दो महीने चला।
इसी दौरान, एक दिन अपन दिल्ली से औरेया लौटे। मेन बाज़ार स्थित दोस्त की दुकान पर पहुंचे तो मोहल्ले के तमाम यार-दोस्तों ने हड़काना शुरु कर दिया। दरअसल, उसी वक्त वही बालिका ट्यूशन पढ़कर वहां से गुजरने वाली थी-जिसके साथ हमारा नाम काफी वक्त तक जोड़ा गया (इसी बालिका से जुड़ा पुराना किस्सा)। हमें पता नहीं था-लेकिन कहां मानने वाले थे। उनका कहना था कि हम ठीक पांच बजे वहां पहुंचे ही इसलिए हैं क्योंकि बालिका गुजरने वाली है।
बहरहाल,दोस्तों ने गालियां देनी शुरु कीं। "साले कुछ नहीं कर सकते। एक लड़की से कभी दो शब्द तक नहीं बोल पाए -जिंदगी में क्या खाक कुछ करोगे"...वगैरह वगैरह।
जवानी की दहलीज पर कदम रखा था-तो खून को उबाल मारना ही था। अपन ने भी जोश में कह डाला-शर्त लगाओ तो बात करके दिखाते हैं।
शर्त सुनकर हमारा एक दोस्त भी ताव खा गया। उसने भी आव देखा न ताव, जेब में 800 रुपये निकालर पटक दिए। कहा-रही आठ सौ रुपये की शर्त।
मर्द की जुबां थी-पीछे हटना मुश्किल था। मोहल्ले के तमाम तुर्रम खां वहां जमा थे। बात से पलटना नामुमकिन-सो जींस को कसा और कहा-ठीक है,पूरी शर्त बताओ।
शर्त तय हुई -सिर्फ बात करके दिखाना है। मेरी कोई भी बात का लड़की ने जवाब दिया तो शर्त जीता-नहीं दिया तो हारा। लेकिन, यह तय कैसे होगा? इसके लिए, चार-छह मित्र अलग अलग एंगल से खड़े हो लिए।
अब,वो ऐतिहासिक पल आ गया....। ट्यूशन छूटा तो बालिका तमाम सहेलियों के साथ निकल पड़ी। धड़कन 500 किलोमीटर की रफ्तार से दौड़ कर रही थी। पीछे हटना मुश्किल था-लेकिन कदम आगे भी नहीं बढ रहे थे। जो लड़की सैकड़ों बार गली में अकेले मिली हो-तब उससे बात नहीं कर पाए हों, उससे पूरे मोहल्ले के सामने,उसकी सहेलियों के बीच कैसे बात मुमकिन है? लेकिन, करें तो क्या। बजरंगबली का नाम लिया और चल दिए किला फतह करने।
हमने बिलकुल पास पहुंचकर जैसे ही उसे उसके नाम से पुकारा....एक झटके में सभी लड़कियों ने पलट कर मेरी तरफ देखा। लेकिन,जनाब मुश्किल में कोई किसी का साथ नहीं देता। सो यहां भी हुआ। बालिका की तमाम सहेलियां उसका साथ छोड़कर आगे चलती बनी, सिर्फ एक को छोड़कर। लेकिन,जब अपन ने कहा- मुझे तुमसे कुछ बात करनी है, तो वो भी निकल ली।
अब तक मोहल्ले के हर आदमी की नज़रें हम पर टिक चुकीं थी।
संवाद शुरु-
ए, मुझे तुमसे कुछ बात करनी है...
उसने करीब चार सेकेंड मुझे देखा.....लगा कि जवाब देगी-लेकिन वो तो चल पड़ी आगे...
अचानक उसे आगे बढ़ता देख हमारी जुबां ने काम करना बंद कर दिया। खुदा जाने कैसे हमारा हाथ उठा-और उसकी कलाई थाम ली।
"वो और मैं सामने थे। आंखों में आंखे। कई निगाहें इस हरकत पर जमी बैठी थी। अचानक उसकी कलाई हमने थाम ली। पूरा मोहल्ला सन्न। कब क्या होगा ?"
लेकिन,उसने धीरे से जवाब दिया- पीयूष तुम पागल हो गए हो क्या? छोड़ो मुझे।
उसने जवाब दिया-तो हाथ छूट गया।
अपन शर्त जीत गए-लेकिन कई लोगों का भरोसा हार गए। इस हरकत के बाद पिटना भी तय था। लेकिन,मालूम था कि शिकायत सुबह होगी-सो रात में ही सीएस का फॉर्म लेने की बात कही और सुबह पांच बजे कानपुर निकल पड़े।
रात के डेढ़ बजे लौटे तो शिकायत हो चुकी थी। पिता जी ने कुछ नहीं कहा-लेकिन मां ने खूब खरी-खोटी सुनाई। अगले दिन-बापू ने फरमान सुनाया- आइंदा ऐसी हरकत न हो-और उस गली में अब मत जाना।
चौदह-पंद्रह साल हो गए-अपन उस गली में नहीं गए।
-पीयूष
मंगलवार, 1 मई, 2007
यूपी बोर्ड धन्य हो !
सीबीएसई के नतीजे आने वाले हैं। सुना है, बहुत पढ़ाई करनी पड़ती है, तब जाकर सीबीएसई बोर्ड के बच्चे 80-90 फीसदी अंक ला पाते हैं। बड़ी मारा मारी है जनाब । लेकिन, अपन तो ठहरे देहाती- वो भी यूपी बोर्ड वाले।
भइया, किस्सा यूं याद आ गया, जब एक सीबीएसई बोर्ड वाले बच्चे को रिलज्ट के तनावग्रस्त हुए देखा। बहरहाल, अपन को भरोसा है कि वो पास हो जाएगा। दिक्कत यह है कि बच्चे पास नहीं होना चाहते, नंबरों में छप्पर फाड़ देना चाहते हैं। अगर 100 से भी ज्यादा नंबर लाने के लिए कोई ट्यूशन शुरु हो जाए तो बच्चे वहां भी जाने लगें।
बहरहाल,अपना किस्सा तो पास होने वाला है। यूपी बोर्ड के दसवीं के इम्तिहान के नतीजे आने को थे। उन दिनों अख़बार में रिजल्ट प्रकाशित होता था। नेट-फेट कुछ नहीं था। ये सुविधा नहीं थी कि चुप्पे से रिलल्ट देखा और चादर तान के सो गए। तब तो पूरा मोहल्ला अखबार के पीछे दौड़ता था, और उसी वक्त झंडा गढ़ जाता था या उखड़ जाता था।
कल्याण सिंह ने नकल नहीं होने दी थी-लिहाजा सारे शेर ढक्कन हो लिए थे। अपन नकलची नहीं थे (कम से कम 12वीं तक) -लेकिन माहौल में इतना टेरर था कि फेल होने की पूरी आशंका थी। नतीजे वाला अखबार कानपुर से औरेया पहुंच चुका था। अपने चेहरे पर झूठी मुस्कुराहट तैर रही थी। पिता जी ने आश्वासन दिया- कुंभ का मेला नहीं है,जो....कोई बात नहीं-फेल हो गए तो भी कोई बात नहीं...
इस आश्वासन से बल मिला लेकिन डर के मारे दिल धक धक कर रहा था। पर यूपी बोर्ड धन्य हो....। यूपी बोर्ड के इतिहास में महज 14 फीसदी रिजल्ट आया और अपन पास हो गए। सेकेन्ड डिवीजन।
लेकिन,यूपी बोर्ड की सही मायने में उदारता 12वीं के इम्तिहान के दौरान दिखायी पड़ी। अपन मैथमेटेक्सि के छात्र थे। हालांकि, आज पूरे ब्लॉग जगत के सामने यह स्वीकार करता हूं कि अगर गणित का मतलब महज बीजगणित होता तो नंबरों में चंद गोल बीज से ज्यादा कभी कुछ नसीब नहीं होते। लेकिन, भगवान ने ही अंकगणित भी बनायी है। खैर, अपन मैथमेटिक्सि के छात्र थे। फिजिक्स-कैमिस्ट्री भी थी। गुमान था कि भौतिक विज्ञान में झंडा गाढ देंगे। हिन्दी-अंग्रेजी तारणहार बनेंगी। कैमिस्ट्री ठीक ठाक है ही और गणित में भी 45-50 नंबर आ ही जाएंगे।
हिन्दी-अग्रेजी और कैमिस्ट्री के पेपर ठीक ठाक निपट लिए। लेकिन,फिजिक्स का पेपर उतना शानदार नहीं हुआ-जितना सोचा था। लगा, अब फर्स्ट डिवीजन नहीं आएगी। मूड उखड़ गया तो अपन भी उखड़ लिए। सोचा, अब पेपर ही नहीं देने। ड्रॉप । फिर खयाल आया कि इम्तिहान देने नहीं पहुंचे तो घर पर पता चल जाएगा। मोहल्ले के लड़के सारा प्लान गुड़गोबर कर देंगे-सो तय किया कि पेपर देने पहुंचेगे पर लिखेंगे कुछ नहीं।
इसी दौरान,दोस्तों से बात हुई तो हमने कह डाला-"अपना पास होना तो मुश्किल है"
मजे की बात देखिए, एक दोस्त ने हम पर भरोसा जताया और बोला-"ऐसा हो नहीं सकता"
इस बात पर एक किलो रमाकांत की मिठाई की शर्त लग गई। हमने सोचा-चलो फेल होंगे, लेकिन मिठाई तो पक्की हो ही गई।
आखिरी इम्तिहान गणित का था। गणित में तीन पेपर होते थे। हमने पहले पेपर में कुछ नहीं लिखा अलबत्ता दो-चार सवाल आते थे तो उन्हें हल कर दिया। तीन घंटे बैठे रहे और चलते चलते सब सवाल काट कर "रफ" लिख डाला। दूसरे पेपर में भी यही खेल किया। तीसरे पेपर के साथ इंटर की परीक्षाएं खत्म होनी थी। खूब नकल हुई। दोस्त-यारों ने खाली बैठा देख कहा- क्या चाहिए, कौन सा सवाल...बताओ? अपन ने कहा, नहीं भाई, हो गया।
नतीजे आए, तो अपन उतने तनावग्रस्त नहीं थे। इस बार मालूम था कि फेल होना है। घर पर कोई कुछ न कहे, इसलिए घर पर भी ऐलान कर दिया कि फेल होना तय है।
लेकिन,धन्य हो यूपी बोर्ड। खुदा जाने किन मास्साब ने कॉपी जांची? उन रफ सवालों पर भी अंक दे डाले और गणित में चार ग्रेस मार्क्स के साथ हमें पास कर डाला। कुल अंक आए 50 फीसदी।
यूपी बोर्ड की इसी महिमा ने हमें पत्रकार बना दिया.....कैसे..यह किस्सा फिर कभी। हां, रिजल्ट आते ही एक किलो मिठाई खाने वो साला दोस्त भी फौरन टपक पड़ा था।
-पीयूष