"वो और मैं सामने थे। आंखों में आंखे। कई निगाहें इस हरकत पर जमी बैठी थी। अचानक उसकी कलाई हमने थाम ली। पूरा मोहल्ला सन्न। कब क्या होगा ?"
भइए, यह कहानी भी अपनी ही ज़िंदगी का किस्सा है। इस किस्से में रोमांच तो बहुत है-लेकिन हमें अफ़सोस भी है। दरअसल, ज़िंदगी में इकलौती बार हमने (गलती से ही सही) लड़की छेड़ दी। वो भी सरेबाज़ार।
अब, क्यों और कैसे हुआ यह वाक्या-इससे पहले एक फ्लैश बैक-
बाहरवीं में 50 फीसदी नंबर लेकर अपन पास तो हो गए- लेकिन ख्वाब था कि आगरा के सेंट जॉस कॉलेज में दाखिला मिले। शायद, यह ख्वाब जिद में तब्दील हो चुका था-लिहाजा औरेया में एडमिशन लिया नहीं और सेंट जॉंस में एडमिशन मिला नहीं। हां, भाई-बंधु लगातार यह आश्वासन दिलाते रहे कि बस,अब हुआ कि तब हुआ। लेकिन, नहीं हुआ। जिद में एक साल बर्बाद कर लेने से पिताजी और हममें शीत युद्ध छिड़ गया। उनके सुबह दफ़्तर निकलने से पहले अपन घर से निकल जाते। दोस्त की दुकान पर अख़बार चाटते और जलेबी-समोसे खिलाने का ऑर्डर देते। दोपहर में दो-तीन घंटे की नींद निकालने के बाद शाम को बापू के घर लौटने से पहले फिर निकल लेते। इस बीच, इक्का-दुक्का बार पिता से सामना हो गया-तो युद्ध तय। भाई, जब बाप से युद्ध कर बैठे हो-तो पैसे मांगने में भी बेइज्जती लगती। ये युद्ध करीब दो महीने चला।
इसी दौरान, एक दिन अपन दिल्ली से औरेया लौटे। मेन बाज़ार स्थित दोस्त की दुकान पर पहुंचे तो मोहल्ले के तमाम यार-दोस्तों ने हड़काना शुरु कर दिया। दरअसल, उसी वक्त वही बालिका ट्यूशन पढ़कर वहां से गुजरने वाली थी-जिसके साथ हमारा नाम काफी वक्त तक जोड़ा गया (इसी बालिका से जुड़ा पुराना किस्सा)। हमें पता नहीं था-लेकिन कहां मानने वाले थे। उनका कहना था कि हम ठीक पांच बजे वहां पहुंचे ही इसलिए हैं क्योंकि बालिका गुजरने वाली है।
बहरहाल,दोस्तों ने गालियां देनी शुरु कीं। "साले कुछ नहीं कर सकते। एक लड़की से कभी दो शब्द तक नहीं बोल पाए -जिंदगी में क्या खाक कुछ करोगे"...वगैरह वगैरह।
जवानी की दहलीज पर कदम रखा था-तो खून को उबाल मारना ही था। अपन ने भी जोश में कह डाला-शर्त लगाओ तो बात करके दिखाते हैं।
शर्त सुनकर हमारा एक दोस्त भी ताव खा गया। उसने भी आव देखा न ताव, जेब में 800 रुपये निकालर पटक दिए। कहा-रही आठ सौ रुपये की शर्त।
मर्द की जुबां थी-पीछे हटना मुश्किल था। मोहल्ले के तमाम तुर्रम खां वहां जमा थे। बात से पलटना नामुमकिन-सो जींस को कसा और कहा-ठीक है,पूरी शर्त बताओ।
शर्त तय हुई -सिर्फ बात करके दिखाना है। मेरी कोई भी बात का लड़की ने जवाब दिया तो शर्त जीता-नहीं दिया तो हारा। लेकिन, यह तय कैसे होगा? इसके लिए, चार-छह मित्र अलग अलग एंगल से खड़े हो लिए।
अब,वो ऐतिहासिक पल आ गया....। ट्यूशन छूटा तो बालिका तमाम सहेलियों के साथ निकल पड़ी। धड़कन 500 किलोमीटर की रफ्तार से दौड़ कर रही थी। पीछे हटना मुश्किल था-लेकिन कदम आगे भी नहीं बढ रहे थे। जो लड़की सैकड़ों बार गली में अकेले मिली हो-तब उससे बात नहीं कर पाए हों, उससे पूरे मोहल्ले के सामने,उसकी सहेलियों के बीच कैसे बात मुमकिन है? लेकिन, करें तो क्या। बजरंगबली का नाम लिया और चल दिए किला फतह करने।
हमने बिलकुल पास पहुंचकर जैसे ही उसे उसके नाम से पुकारा....एक झटके में सभी लड़कियों ने पलट कर मेरी तरफ देखा। लेकिन,जनाब मुश्किल में कोई किसी का साथ नहीं देता। सो यहां भी हुआ। बालिका की तमाम सहेलियां उसका साथ छोड़कर आगे चलती बनी, सिर्फ एक को छोड़कर। लेकिन,जब अपन ने कहा- मुझे तुमसे कुछ बात करनी है, तो वो भी निकल ली।
अब तक मोहल्ले के हर आदमी की नज़रें हम पर टिक चुकीं थी।
संवाद शुरु-
ए, मुझे तुमसे कुछ बात करनी है...
उसने करीब चार सेकेंड मुझे देखा.....लगा कि जवाब देगी-लेकिन वो तो चल पड़ी आगे...
अचानक उसे आगे बढ़ता देख हमारी जुबां ने काम करना बंद कर दिया। खुदा जाने कैसे हमारा हाथ उठा-और उसकी कलाई थाम ली।
"वो और मैं सामने थे। आंखों में आंखे। कई निगाहें इस हरकत पर जमी बैठी थी। अचानक उसकी कलाई हमने थाम ली। पूरा मोहल्ला सन्न। कब क्या होगा ?"
लेकिन,उसने धीरे से जवाब दिया- पीयूष तुम पागल हो गए हो क्या? छोड़ो मुझे।
उसने जवाब दिया-तो हाथ छूट गया।
अपन शर्त जीत गए-लेकिन कई लोगों का भरोसा हार गए। इस हरकत के बाद पिटना भी तय था। लेकिन,मालूम था कि शिकायत सुबह होगी-सो रात में ही सीएस का फॉर्म लेने की बात कही और सुबह पांच बजे कानपुर निकल पड़े।
रात के डेढ़ बजे लौटे तो शिकायत हो चुकी थी। पिता जी ने कुछ नहीं कहा-लेकिन मां ने खूब खरी-खोटी सुनाई। अगले दिन-बापू ने फरमान सुनाया- आइंदा ऐसी हरकत न हो-और उस गली में अब मत जाना।
चौदह-पंद्रह साल हो गए-अपन उस गली में नहीं गए।
-पीयूष
गुरुवार, 3 मई, 2007
जब छिड़ गई लड़की नादानी में
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8 टिप्पणियाँ:
अब होके आओ.. और मेरी मानो तो उस्से मिल के भी आओ.. वहाँ तो मिलेगी ना.. और कभी मिल जाय तो रुक के बात ज़रूर कर लेना..अपने भांजोभांजी का नाम पूछना तो बिलकुले मति भूलना..
अभय जी सही राय दे रहो हो अगला पहले ही मामा बन चुक है अब आप पक्का बनवा दो
अभय-अरुण जी,
राय के लिए शुक्रिया..
वैसे,मामा कहो या चाचा..वो तो बहुत पहले बन लिए।
मिले भले न हों, पर दुश्मन दोस्त ख़बर तो देते ही रहते हैं
मजेदार किस्सा पीयूष भाई। खूब जारी रखो यह किस्सागोई। ब्लॉग की यही तो खूबी है बंदा जो सामने नहीं बता सकता इस पर पूरी ईमानदारी से लिखता है।
वैसे वो फिर कभी नहीं मिली क्या ? :(
दोस्त दुश्मन क्या खबर बतायें हैं रिसेन्ट की?? वो भी तो बताओ :)
क्या बात है। लगे रहो पीयूश भाई।
किस्सागोई का लहजा वाकई मजेदार रहा !
पीयुष ये बडी हिम्मत का काम किया तुमने|वाकई बडे बहादुर हो|
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